Chakra & Energy

प्राण क्या है?

admin 29 Feb 2020 1 min read 43,560

प्राण योग और तंत्र की सबसे मौलिक अवधारणाओं में से एक है। सामान्य भाषा में प्राण को साँस या जीवन वायु कहा जाता है, लेकिन वास्तव में प्राण इससे कहीं अधिक व्यापक है। प्राण वह सूक्ष्म जीवन ऊर्जा है जो शरीर, मन और चेतना को सक्रिय रखती है। बिना प्राण के शरीर जड़ है और मन निष्क्रिय।

प्राण की परिभाषा

प्राण का शाब्दिक अर्थ है — “जो जीवित रखे” या “जीवन शक्ति”। योग दर्शन में प्राण को उस सार्वभौमिक ऊर्जा का व्यक्तिगत रूप माना गया है जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। इसे चीन में “ची” और जापान में “की” कहा जाता है।

प्राण केवल श्वास नहीं है। श्वास प्राण का सबसे स्थूल और दृश्य रूप है। श्वास के माध्यम से हम प्राण को ग्रहण और नियंत्रित करते हैं, लेकिन प्राण स्वयं सूक्ष्म है।

प्राण के पाँच मुख्य प्रकार (पंच प्राण)

योग और आयुर्वेद में प्राण को पाँच प्रमुख भागों में बाँटा गया है:

  1. प्राण — हृदय और छाती क्षेत्र में। श्वास लेने, निगलने और हृदय गति से संबंधित।
  2. अपान — नाभि के नीचे। मल-मूत्र त्याग, प्रसव और नीचे की ओर ऊर्जा से संबंधित।
  3. समान — नाभि क्षेत्र में। पाचन और पोषक तत्वों के वितरण से संबंधित।
  4. उदान — कण्ठ और सिर में। वाणी, उत्थान और ऊपर की ओर ऊर्जा से संबंधित।
  5. व्यान — पूरे शरीर में। रक्त संचार और ऊर्जा के वितरण से संबंधित।

इन पाँचों के अतिरिक्त और भी उप-प्राण माने गए हैं, लेकिन मुख्य रूप से ये पाँच ही महत्वपूर्ण हैं।

प्राण और श्वास का संबंध

श्वास प्राण का वाहन है। जब हम श्वास लेते हैं तो प्राण शरीर में प्रवेश करता है, जब छोड़ते हैं तो अपान सक्रिय होता है। प्राणायाम का पूरा विज्ञान इसी सिद्धांत पर आधारित है कि श्वास को नियंत्रित करके प्राण को नियंत्रित किया जा सकता है।

प्राण के नियंत्रण से:

  • मन शांत होता है
  • ऊर्जा संतुलित होती है
  • चक्र सक्रिय होते हैं
  • कुंडलिनी के जागरण में सहायता मिलती है

प्राण और मन

योग सूत्र में कहा गया है कि मन और प्राण आपस में जुड़े हुए हैं। जब मन चंचल होता है तो प्राण भी अस्थिर हो जाता है। जब प्राण स्थिर होता है तो मन भी स्थिर हो जाता है। इसलिए प्राणायाम को चित्तवृत्ति निरोध का महत्वपूर्ण साधन माना गया है।

प्राण और कुंडलिनी

कुंडलिनी जागरण वास्तव में प्राण का ही ऊर्ध्वगमन है। सामान्य अवस्था में प्राण इडा और पिंगला नाड़ियों में बहता है। जब साधना से प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करता है, तो कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया शुरू होती है। इसलिए प्राण को कुंडलिनी का वाहक भी कहा जाता है।

प्राण का स्रोत

प्राण का मुख्य स्रोत है:

  • श्वास (हवा)
  • भोजन
  • सूर्य प्रकाश
  • जल
  • और सबसे सूक्ष्म स्तर पर — ब्रह्मांडीय ऊर्जा

तांत्रिक और योगिक साधना में साधक इन स्रोतों से प्राण को अधिक मात्रा में ग्रहण और संरक्षित करने का अभ्यास करता है।

प्राण का क्षय और संरक्षण

क्रोध, भय, अत्यधिक यौन व्यय, अनियमित जीवन और नकारात्मक विचारों से प्राण क्षीण होता है। दूसरी ओर नियमित प्राणायाम, ध्यान, सात्विक आहार, संयम और सकारात्मक भाव से प्राण बढ़ता और सुरक्षित रहता है।

ओजस को प्राण का ही सूक्ष्म और परिष्कृत रूप माना गया है।

निष्कर्ष

प्राण जीवन का आधार है। श्वास उसका स्थूल रूप है। मन उसका सूक्ष्म संबंध है। कुंडलिनी उसका जागृत रूप है।

जो साधक प्राण को समझकर उसे नियंत्रित कर लेता है, वह शरीर, मन और ऊर्जा तीनों पर अधिकार प्राप्त कर लेता है।

प्राण की साधना ही वास्तव में जीवन की साधना है। क्योंकि प्राण जहाँ स्थिर होता है, वहाँ चेतना भी स्थिर हो जाती है।

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