स्त्री योनि: अशुभ या तंत्र का द्वार?

admin 26 Jun 2022 1 min read 2,347

भारतीय समाज और कई रूढ़िवादी परंपराओं में स्त्री योनि को लेकर लंबे समय से दोहरे भाव रहे हैं। एक ओर उसे सृष्टि का स्रोत माना गया, दूसरी ओर उसे अशुभ, अपवित्र या छुपाने योग्य वस्तु कह दिया गया। तंत्र ने इस दृष्टि को पूरी तरह चुनौती दी। तंत्र पूछता है — जो द्वार जीवन को जन्म देता है, वह अशुभ कैसे हो सकता है?

रूढ़िवादी दृष्टि में योनि

कई पारंपरिक मान्यताओं में योनि को अशुद्धि से जोड़ा गया। मासिक धर्म को अपवित्र माना गया, प्रसव के बाद स्त्री को अशुद्ध कहा गया, और योनि को सार्वजनिक चर्चा से बाहर रखा गया। इस सोच के पीछे शरीर के प्रति भय, नियंत्रण और पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण रहा है। परिणाम यह हुआ कि स्त्री के शरीर के सबसे रचनात्मक हिस्से को शर्म और रहस्य के अंधेरे में धकेल दिया गया।

तंत्र की दृष्टि

तंत्र इस पूरे दृष्टिकोण को अस्वीकार करता है। तंत्र कहता है:

योनि शक्ति का द्वार है। योनि सृष्टि का मुख है। योनि कुंडलिनी की निद्रा और जागरण दोनों से जुड़ी है।

तांत्रिक ग्रंथों में योनि को कमल, गुफा, वेदी और महाद्वार कहा गया है। श्री यंत्र में सबसे केंद्र का बिंदु (बिंदु) योनि का ही प्रतीक है। जहाँ से सारी सृष्टि फूटती है। भैरवी, काली, त्रिपुरसुंदरी जैसी शक्तियों की उपासना में योनि को पवित्र प्रतीक माना गया है।

योनि = शक्ति का केंद्र

तंत्र के अनुसार स्त्री शरीर में स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्र विशेष रूप से सक्रिय होते हैं। योनि इन चक्रों से सीधे जुड़ी हुई है। यहाँ की ऊर्जा रचनात्मक भी है और रूपांतरणकारी भी। जब इस ऊर्जा को सम्मान और होश के साथ देखा जाता है, तो वह साधना का माध्यम बन जाती है। जब इसे अपवित्र या केवल भोग्य माना जाता है, तो वही ऊर्जा विकृत हो जाती है।

तांत्रिक साधना में योनि की पूजा (योनि पूजा) का उल्लेख मिलता है। इसका अर्थ शारीरिक भोग नहीं, बल्कि शक्ति के स्रोत के प्रति गहन सम्मान है। यहाँ योनि को देवी का रूप मानकर पुष्प, चंदन और मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है।

अशुभ क्यों नहीं?

जो अंग जीवन को जन्म देता है, वह अशुभ कैसे हो सकता है? जो द्वार से मनुष्य संसार में आता है, उसे अपवित्र कहना स्वयं जीवन का अपमान है।

तंत्र कहता है कि अशुभ कोई वस्तु नहीं होती। अशुभ दृष्टि होती है। जब दृष्टि कलुषित होती है, तो सब कुछ अशुभ दिखने लगता है। जब दृष्टि शुद्ध होती है, तो शरीर का हर हिस्सा पवित्र हो जाता है।

तंत्र का द्वार

योनि को तंत्र में द्वार इसलिए कहा गया है क्योंकि:

  • यहाँ से जीवन प्रवेश करता है।
  • यहाँ काम ऊर्जा का केंद्र है।
  • यहाँ से कुंडलिनी के जागरण की संभावनाएँ खुलती हैं।
  • यहाँ स्त्री और पुरुष ऊर्जा का मिलन संभव है।

लेकिन यह द्वार केवल शारीरिक नहीं है। यह प्रतीक है उस गहरे प्रवेश का जहाँ साधक अपने अहंकार को छोड़कर शक्ति के सामने समर्पित होता है।

आधुनिक संदर्भ में महत्व

आज भी कई स्त्रियाँ अपने शरीर के इस हिस्से को लेकर शर्म या घृणा महसूस करती हैं। तंत्र की दृष्टि उन्हें मुक्त कर सकती है। यदि स्त्री अपनी योनि को शक्ति का केंद्र मानकर सम्मान दे, तो उसकी ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर उठने लगती है। पुरुष यदि योनि को केवल भोग का साधन न मानकर शक्ति का द्वार माने, तो उसका दृष्टिकोण भी बदल जाता है।

निष्कर्ष

स्त्री योनि अशुभ नहीं है। वह तंत्र का द्वार है — सृष्टि का, शक्ति का और जागरण का।

अशुभ वह दृष्टि है जो जीवन के स्रोत को शर्मनाक बनाती है। पवित्र वह दृष्टि है जो उसी स्रोत में दिव्यता देखती है।

तंत्र हमें चुनने के लिए कहता है — तुम योनि को अशुभ मानोगे या शक्ति का द्वार?

उत्तर साधक की दृष्टि पर निर्भर करता है।

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