तंत्र: सम्भोग और जागरण
तंत्र में सम्भोग और जागरण को एक-दूसरे से अलग नहीं माना गया है। अधिकांश लोग सम्भोग को केवल शारीरिक क्रिया समझते हैं और जागरण को किसी गुफा में बैठकर होने वाली घटना। तंत्र इन दोनों धारणाओं को तोड़ता है।
तंत्र कहता है — सम्भोग यदि होश के साथ हो, तो वह जागरण का द्वार बन सकता है। और जागरण यदि शरीर और ऊर्जा को नकारकर हो, तो वह अधूरा रह जाता है।
सम्भोग का तांत्रिक अर्थ
साधारण भाषा में सम्भोग का अर्थ शारीरिक मिलन है। तंत्र में इसका अर्थ कहीं गहरा है। सम्भोग का वास्तविक अर्थ है — दो ऊर्जाओं का मिलन। स्त्री ऊर्जा (शक्ति) और पुरुष ऊर्जा (शिव)। जब ये दोनों ऊर्जाएँ जागरूकता के साथ एक होती हैं, तब शरीर गौण हो जाता है और ऊर्जा प्रधान हो जाती है।
तंत्र शरीर को नकारता नहीं। वह शरीर को माध्यम बनाता है। जैसे दीपक की बाती तेल को प्रकाश में बदल देती है, वैसे ही होशयुक्त सम्भोग काम ऊर्जा को दिव्य ऊर्जा में बदल देता है।
जागरण क्या है?
जागरण का अर्थ है — सुप्त शक्ति का जागना। कुंडलिनी शक्ति मूलाधार में सोई रहती है। जब वह जागती है और सुषुम्ना नाड़ी से ऊपर उठती है, तो साधक की चेतना बदल जाती है। यह जागरण अचानक भी हो सकता है और धीरे-धीरे भी।
तांत्रिक मार्ग में जागरण का एक शक्तिशाली माध्यम सम्भोग है — बशर्ते वह होश, श्वास और शुद्ध उद्देश्य के साथ हो।
सम्भोग से जागरण तक की प्रक्रिया
- होश — सम्भोग के दौरान मन भटकने न पाए। हर स्पर्श, हर श्वास, हर कंपन को साक्षी भाव से देखा जाए।
- श्वास — श्वास गहरी और एक हो। श्वास ही ऊर्जा को ऊपर ले जाने का वाहन है।
- ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन — आर्गेज्म की ऊर्जा को बाहर न निकालकर पूरे शरीर में फैलाया जाए। इसे रोकने के लिए मूलबंध और ध्यान सहायक होते हैं।
- भाव — कोई शोषण न हो, कोई स्वार्थ न हो। केवल समर्पण और मिलन का भाव हो।
जब ये चार तत्व उपस्थित होते हैं, तो सम्भोग साधना बन जाता है। ऊर्जा स्वाधिष्ठान से ऊपर उठती है और क्रमशः चक्रों को सक्रिय करती हुई सहस्रार तक पहुँचती है। यही जागरण है।
याब-युम और अन्य मुद्राएँ
याब-युम मुद्रा इस प्रक्रिया के लिए विशेष रूप से उपयुक्त मानी गई है। इसमें दोनों शरीर पूरी तरह सटे रहते हैं, श्वास एक होती है और ऊर्जा का आदान-प्रदान सहज हो जाता है। लेकिन मुद्रा स्वयं में पर्याप्त नहीं है। मुद्रा के पीछे होश और शुद्ध भाव होना आवश्यक है।
सावधानी
सम्भोग को जागरण का माध्यम बनाना आसान नहीं है। बिना तैयारी के, बिना मार्गदर्शन के और केवल उत्तेजना के वश में होकर किया गया अभ्यास ऊर्जा को बिखेर सकता है। इसलिए:
- पहले शरीर और मन को शुद्ध करें
- प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास बढ़ाएँ
- उद्देश्य स्पष्ट रखें
- यदि संभव हो तो अनुभवी मार्गदर्शक की सलाह लें
निष्कर्ष
तंत्र का संदेश स्पष्ट है —
सम्भोग को दबाओ मत। सम्भोग में डूबो मत। सम्भोग को होश के साथ जियो और उसे जागरण में बदल दो।
जब स्त्री ऊर्जा और पुरुष ऊर्जा होशपूर्वक मिलती हैं, तब शरीर के पार की यात्रा शुरू होती है। वही यात्रा सम्भोग से शुरू होकर जागरण पर पूर्ण होती है।
यही तंत्र का हृदय है।
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