तांत्रिक मैथुन: शक्ति का जागरण
तांत्रिक मैथुन केवल संभोग नहीं है। यह शिव और शक्ति के दिव्य मिलन की साधना है। जब दो शरीर याब-युम मुद्रा में मिलते हैं, तब उद्देश्य सुख भोगना नहीं, बल्कि सुप्त शक्ति को जगाना होता है। यह मार्ग धैर्य, शुद्ध भाव और गहरी संवेदनशीलता माँगता है।
यहाँ याब-युम मुद्रा की संपूर्ण विधि, पार्वती (साधिका) और शिव (साधक) की तैयारी, तथा दोनों के आरंभ करने का क्रम विस्तार से दिया गया है।
1. पार्वती की तैयारी (साधिका)
पार्वती को खुद को शक्ति का जीवित रूप मानकर तैयार होना चाहिए।
- स्नान से प्रारंभ करें। जल में थोड़ा केसर, चंदन या गुलाब जल मिलाएँ।
- शरीर को पूरी तरह सुखाएँ। फिर चंदन, केसर और हल्की कस्तूरी की लेप करें। सुगंध हल्की और पवित्र हो।
- बाल खुले रखें। सुगंधित तेल लगाएँ।
- सोलह श्रृंगार करें — सिंदूर का बड़ा टीका, काजल, लाल या केसरिया वस्त्र, पतली चोली, कंगन, पायल, रुद्राक्ष माला, कमरबंद।
- वस्त्र ऐसे हों जो शरीर की आकृति को निखारें, छिपाएँ नहीं।
- मन में यह भाव लाएँ — “मैं पार्वती हूँ। आज शिव से मिलने जा रही हूँ।”
- योनि को स्वच्छ रखें। हल्का सुगंधित तेल लगाएँ ताकि स्पर्श कोमल हो।
- कम से कम 15-20 मिनट मौन बैठकर श्वास पर ध्यान करें। मूलाधार में ऊर्जा का ध्यान करें।
2. शिव की तैयारी (साधक)
शिव को स्थिर, जागरूक और करुणामय होना चाहिए।
- स्नान करें। शरीर पर हल्का चंदन लगाएँ।
- वस्त्र न्यूनतम रखें या कमर के नीचे सादा वस्त्र। वक्ष नग्न रह सकता है।
- गले में रुद्राक्षमाला धारण करें।
- मन को शांत करें। कोई जल्दबाजी, कोई प्रदर्शन भाव न हो।
- लिंग को स्वच्छ रखें। हल्का तेल लगाएँ।
- ध्यान मुद्रा में बैठें। श्वास गहरी करें। अपने को शिव रूप में अनुभव करें — साक्षी, स्थिर और ग्रहणशील।
- भाव रखें — “मैं शिव हूँ। शक्ति को सम्मान और स्थिरता से ग्रहण करूँगा।”
3. स्थान और वातावरण
- कमरा साफ, मंद रोशनी वाला हो।
- दीपक या मोमबत्ती जलाएँ।
- धूप या लोबान की सुगंध रखें।
- बिस्तर या आसन नरम और साफ हो।
- बाहर के व्यवधान पूरी तरह बंद करें।
- दोनों के पास पानी और हल्का श्वेत वस्त्र रखें।
4. याब-युम मुद्रा की विधि — आरंभ से अंत तक
चरण 1: आमंत्रण
पार्वती सज-धज कर शिव के सामने खड़ी होती है। दोनों एक-दूसरे की आँखों में देखते हैं। पार्वती हाथ जोड़कर कहती है —
“शिव, शक्ति आपके समक्ष अर्पित है। ग्रहण कीजिए।”
शिव सिर हिलाकर स्वीकार करते हैं।
चरण 2: वस्त्र त्याग
दोनों धीरे-धीरे वस्त्र उतारते हैं। जल्दबाजी नहीं। प्रत्येक वस्त्र के उतरने के साथ श्वास गहरी होती जाए। नग्न शरीर एक-दूसरे के सामने आते हैं। दृष्टि सम्मान और आकर्षण दोनों से भरी हो।
चरण 3: स्पर्श और जागरण
शिव पार्वती को पास बुलाते हैं। दोनों शरीर हल्के स्पर्श से शुरू करते हैं — माथा, गाल, गर्दन, स्तन, उदर, कमर। हाथ धीमे और जागरूक हों। पार्वती के स्तनों के निप्पल तन जाएँ, योनि गीली होने लगे — यह स्वाभाविक है। इसे दबाने की जरूरत नहीं, केवल साक्षी रहें।
चरण 4: याब-युम स्थिति
शिव पद्मासन या सुखासन में बैठते हैं। पार्वती उनकी गोद में सामने की ओर बैठती है। उसकी टाँगें शिव की कमर के चारों ओर लिपट जाती हैं। दोनों के हृदय केंद्र सट जाते हैं। माथे लगभग मिल जाते हैं।
शिव का उत्तेजित लिंग पार्वती की गीली योनि के द्वार पर स्पर्श करता है। दोनों श्वास रोककर नहीं, बल्कि गहरी साँस लेते हुए प्रवेश करते हैं। धीरे-धीरे। पूरा। जब लिंग पूर्ण रूप से योनि में समा जाता है, तब दोनों अचल हो जाते हैं।
चरण 5: स्थिर मिलन
अब हिलना नहीं है। केवल श्वास।
- दोनों की श्वास एक लय में लाएँ।
- मूलबंध करें (मूलाधार को हल्का संकुचित करें)।
- ध्यान रीढ़ की हड्डी पर ले जाएँ।
- ऊर्जा को नीचे से ऊपर उठते हुए महसूस करें।
पार्वती की योनि की दीवारें स्वतः लिंग को निचोड़ सकती हैं। शिव इसे साक्षी भाव से ग्रहण करें। यदि आर्गेज्म की लहर आए तो दोनों मूलबंध और श्वास से उसे ऊपर मोड़ें। वीर्य या स्त्री-स्खलन बाहर न जाने दें। ऊर्जा भीतर ही घूमे।
चरण 6: चक्रों का आरोहण
ऊर्जा जब मूलाधार से उठे तो क्रम से:
स्वाधिष्ठान → मणिपुर → अनाहत → विशुद्ध → आज्ञा → सहस्रार।
हर चक्र पर कुछ क्षण रुकें। गर्मी, कंपन, दबाव या प्रकाश महसूस हो सकता है। आँखों से अश्रु आ सकते हैं। शरीर कांप सकता है। इसे रोकें नहीं।
चरण 7: समाप्ति
जब दोनों को लगे कि ऊर्जा पर्याप्त ऊपर उठ चुकी है, तो धीरे-धीरे अलग हों। एक-दूसरे को हृदय से लगाएँ। कुछ देर मौन लेटें या बैठें। जल पिएँ। शरीर को ढक लें।
5. महत्वपूर्ण सावधानियाँ
- पूर्ण सहमति और पारस्परिक सम्मान अनिवार्य है।
- पहली बार में जागरण की अपेक्षा न करें। कई बार अभ्यास लग सकता है।
- यदि कोई असुविधा, भय या अत्यधिक उत्तेजना हो तो तुरंत रोक दें।
- बिना तैयारी और शुद्ध भाव के यह साधना न करें।
- गुरु का मार्गदर्शन हो तो सर्वोत्तम।
निष्कर्ष
तांत्रिक मैथुन में शरीर मंदिर बन जाता है। योनि और लिंग देवता बन जाते हैं। जब पार्वती पूरी तरह सजकर, सुगंधित होकर शिव की गोद में बैठती है और दोनों अचल रहकर ऊर्जा को ऊपर ले जाते हैं, तब काम शक्ति ज्ञान शक्ति में बदलने लगती है।
यही शक्ति का जागरण है।
यही सम्भोग से समाधि की ओर यात्रा है।
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