chakra
सात प्रयास की यात्रा
Shared by @mod_priya · 26 Jul 2021 · 3,488 views
मेरा नाम प्रिया है। राहुल मेरे मौसेरे भाई हैं।
यह कथा किसी एक रात की नहीं है। यह सात प्रयासों की कथा है। जहाँ पहली रात कुछ नहीं हुआ, दूसरी रात थोड़ा कंपन हुआ, और सातवीं रात जाकर शक्ति ने अपना मुख दिखाया।
राहुल तंत्रमणि के पुराने सदस्य थे। एक दिन वे tantramani.com पर अनुभव पढ़ रहे थे। मैं कमरे में चली गई और स्क्रीन पर नज़र पड़ी। पहले तो मैं हँसी। फिर चुपचाप बैठकर पढ़ने लगी। जितना पढ़ती गई, उतना मन अशांत होता गया। आखिरकार मैंने भी सदस्यता ले ली। गुरुजी से बात की। उन्होंने साफ कहा — “जल्दी मत करना। शरीर और मन दोनों तैयार होने चाहिए। पहली बार में कुछ होने की उम्मीद मत रखना।”
हमने तय किया कि मैं मार्गदर्शन करूँगी। क्योंकि मैंने अधिक अध्ययन किया था। राहुल मान गए।
**पहला प्रयास**
पहली रात हम दोनों बहुत उत्साहित थे। मैंने लाल साड़ी पहनी, श्रृंगार किया, लेकिन अंदर घबराहट थी। याब-युम में बैठे। प्रवेश हुआ। शरीर सट गए। श्वास एक करने की कोशिश की। लेकिन मन भाग रहा था। कभी “यह सही है क्या?” का विचार, कभी शरीर की गर्मी, कभी संकोच। दस-बारह मिनट बाद राहुल का नियंत्रण टूटा। ऊर्जा नीचे बह गई। मैंने भी कुछ विशेष महसूस नहीं किया। हम दोनों चुपचाप अलग हो गए। उस रात नींद नहीं आई। लगा जैसे हमने कोई परीक्षा दी हो और फेल हो गए हों।
**दूसरा और तीसरा प्रयास**
दूसरी रात हमने कम अपेक्षा रखी। केवल श्वास पर ध्यान दिया। इस बार बीस मिनट तक अचल रह पाए। मूलाधार में हल्की गर्मी महसूस हुई, लेकिन आगे नहीं बढ़ी। तीसरी रात और बेहतर रही। स्वाधिष्ठान तक कंपन पहुँचा। मेरी योनि में गहरी नमी और स्पंदन हुआ, पर आर्गेज्म की लहर आने से पहले ही टूट गई। राहुल ने कहा — “लगता है अभी जल्दी है।” मैंने सहमति में सिर हिलाया।
**चौथा और पाँचवाँ प्रयास**
चौथी रात हमने पहले एक घंटा केवल ध्यान और मूलबंध किया। फिर मुद्रा में बैठे। इस बार शरीर ज्यादा सहयोग कर रहा था। प्रवेश के बाद हम पैंतीस मिनट तक स्थिर रहे। ऊर्जा मणिपुर तक साफ महसूस हुई। पेट में गर्मी और कंपन। हृदय में दबाव। आँखों में पानी आ गया, लेकिन सहस्रार तक कुछ नहीं पहुँचा। पाँचवीं रात और लंबी हुई। लगभग पचास मिनट। अनाहत चक्र खुलने लगा। छाती में एक विशाल खालीपन और फिर भरने का अहसास हुआ। लेकिन फिर भी अंतिम द्वार बंद था।
**छठा प्रयास**
छठी रात कुछ अलग थी। हम दोनों थक चुके थे उम्मीद से। इसलिए अपेक्षा लगभग खत्म हो चुकी थी। बस साधना के लिए साधना कर रहे थे। याब-युम में बैठे। इस बार प्रवेश के बाद मैंने पूरी तरह शरीर छोड़ दिया। राहुल भी। श्वास बहुत गहरी और धीमी हो गई। लगभग एक घंटे तक हम हिले नहीं। ऊर्जा स्पष्ट रूप से विशुद्ध चक्र तक पहुँची। गले में अजीब कंपन। मुँह के अंदर स्वाद बदल गया। भृकुटी में हल्का दबाव। लगा जैसे कुछ टूटने वाला है, लेकिन टूटा नहीं। रात खत्म हुई तो दोनों के शरीर में भारी थकान थी, लेकिन मन बहुत शांत था।
**सातवाँ प्रयास**
सातवीं रात हमने कोई विशेष तैयारी नहीं की। न ज्यादा श्रृंगार, न ज्यादा उम्मीद। केवल स्नान करके सादी सफेद चादर ओढ़कर बैठ गए।
याब-युम मुद्रा में जब प्रवेश हुआ, तो पहले की तरह कोई उत्तेजना की तीव्रता नहीं थी। बस एक गहरा, स्थिर भराव था। हमने आँखें बंद कर लीं। श्वास अपने आप एक हो गई।
बीस मिनट बाद मूलाधार में सर्प जैसी हलचल शुरू हुई। इस बार वह रुकी नहीं। धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगी। स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत — हर चक्र पर रुककर मानो अनुमति ले रही हो। जब विशुद्ध से गुजरी तो गले में अश्रु की गांठ बन गई। आज्ञा चक्र पर पहुँचते ही भृकुटी के बीच चमकीला प्रकाश फूट पड़ा।
फिर सहस्रार।
उस क्षण शरीर की सीमा मिट गई। मैं प्रिया नहीं रही, राहुल नहीं रहे। केवल एक विशाल, शांत, चमकता हुआ विस्तार रह गया। कोई लहर नहीं थी, कोई आर्गेज्म नहीं था। बस एक अखंड उपस्थिति। समय की कोई गिनती नहीं रही।
जब होश लौटा तो राहुल के आँसू बह रहे थे। मेरे भी। हमने एक-दूसरे को पकड़ रखा था — अब उत्तेजना से नहीं, बल्कि किसी गहरी पहचान से।
राहुल ने धीरे से कहा — “सात बार लगा।”
मैंने उत्तर दिया — “हाँ… और ठीक लगा।”
उस रात के बाद हमने समझा कि शक्ति जल्दी नहीं आती। वह परीक्षा लेती है। धैर्य लेती है। और जब आती है तो शोर नहीं करती। बहुत शांत होकर आती है।
आज भी जब हम साधना करते हैं, तो याद रहता है — पहली रात की असफलता भी उतनी ही जरूरी थी जितनी सातवीं रात की पूर्णता।
क्योंकि जागरण कोई घटना नहीं, एक यात्रा है।
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यह कथा किसी एक रात की नहीं है। यह सात प्रयासों की कथा है। जहाँ पहली रात कुछ नहीं हुआ, दूसरी रात थोड़ा कंपन हुआ, और सातवीं रात जाकर शक्ति ने अपना मुख दिखाया।
राहुल तंत्रमणि के पुराने सदस्य थे। एक दिन वे tantramani.com पर अनुभव पढ़ रहे थे। मैं कमरे में चली गई और स्क्रीन पर नज़र पड़ी। पहले तो मैं हँसी। फिर चुपचाप बैठकर पढ़ने लगी। जितना पढ़ती गई, उतना मन अशांत होता गया। आखिरकार मैंने भी सदस्यता ले ली। गुरुजी से बात की। उन्होंने साफ कहा — “जल्दी मत करना। शरीर और मन दोनों तैयार होने चाहिए। पहली बार में कुछ होने की उम्मीद मत रखना।”
हमने तय किया कि मैं मार्गदर्शन करूँगी। क्योंकि मैंने अधिक अध्ययन किया था। राहुल मान गए।
**पहला प्रयास**
पहली रात हम दोनों बहुत उत्साहित थे। मैंने लाल साड़ी पहनी, श्रृंगार किया, लेकिन अंदर घबराहट थी। याब-युम में बैठे। प्रवेश हुआ। शरीर सट गए। श्वास एक करने की कोशिश की। लेकिन मन भाग रहा था। कभी “यह सही है क्या?” का विचार, कभी शरीर की गर्मी, कभी संकोच। दस-बारह मिनट बाद राहुल का नियंत्रण टूटा। ऊर्जा नीचे बह गई। मैंने भी कुछ विशेष महसूस नहीं किया। हम दोनों चुपचाप अलग हो गए। उस रात नींद नहीं आई। लगा जैसे हमने कोई परीक्षा दी हो और फेल हो गए हों।
**दूसरा और तीसरा प्रयास**
दूसरी रात हमने कम अपेक्षा रखी। केवल श्वास पर ध्यान दिया। इस बार बीस मिनट तक अचल रह पाए। मूलाधार में हल्की गर्मी महसूस हुई, लेकिन आगे नहीं बढ़ी। तीसरी रात और बेहतर रही। स्वाधिष्ठान तक कंपन पहुँचा। मेरी योनि में गहरी नमी और स्पंदन हुआ, पर आर्गेज्म की लहर आने से पहले ही टूट गई। राहुल ने कहा — “लगता है अभी जल्दी है।” मैंने सहमति में सिर हिलाया।
**चौथा और पाँचवाँ प्रयास**
चौथी रात हमने पहले एक घंटा केवल ध्यान और मूलबंध किया। फिर मुद्रा में बैठे। इस बार शरीर ज्यादा सहयोग कर रहा था। प्रवेश के बाद हम पैंतीस मिनट तक स्थिर रहे। ऊर्जा मणिपुर तक साफ महसूस हुई। पेट में गर्मी और कंपन। हृदय में दबाव। आँखों में पानी आ गया, लेकिन सहस्रार तक कुछ नहीं पहुँचा। पाँचवीं रात और लंबी हुई। लगभग पचास मिनट। अनाहत चक्र खुलने लगा। छाती में एक विशाल खालीपन और फिर भरने का अहसास हुआ। लेकिन फिर भी अंतिम द्वार बंद था।
**छठा प्रयास**
छठी रात कुछ अलग थी। हम दोनों थक चुके थे उम्मीद से। इसलिए अपेक्षा लगभग खत्म हो चुकी थी। बस साधना के लिए साधना कर रहे थे। याब-युम में बैठे। इस बार प्रवेश के बाद मैंने पूरी तरह शरीर छोड़ दिया। राहुल भी। श्वास बहुत गहरी और धीमी हो गई। लगभग एक घंटे तक हम हिले नहीं। ऊर्जा स्पष्ट रूप से विशुद्ध चक्र तक पहुँची। गले में अजीब कंपन। मुँह के अंदर स्वाद बदल गया। भृकुटी में हल्का दबाव। लगा जैसे कुछ टूटने वाला है, लेकिन टूटा नहीं। रात खत्म हुई तो दोनों के शरीर में भारी थकान थी, लेकिन मन बहुत शांत था।
**सातवाँ प्रयास**
सातवीं रात हमने कोई विशेष तैयारी नहीं की। न ज्यादा श्रृंगार, न ज्यादा उम्मीद। केवल स्नान करके सादी सफेद चादर ओढ़कर बैठ गए।
याब-युम मुद्रा में जब प्रवेश हुआ, तो पहले की तरह कोई उत्तेजना की तीव्रता नहीं थी। बस एक गहरा, स्थिर भराव था। हमने आँखें बंद कर लीं। श्वास अपने आप एक हो गई।
बीस मिनट बाद मूलाधार में सर्प जैसी हलचल शुरू हुई। इस बार वह रुकी नहीं। धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगी। स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत — हर चक्र पर रुककर मानो अनुमति ले रही हो। जब विशुद्ध से गुजरी तो गले में अश्रु की गांठ बन गई। आज्ञा चक्र पर पहुँचते ही भृकुटी के बीच चमकीला प्रकाश फूट पड़ा।
फिर सहस्रार।
उस क्षण शरीर की सीमा मिट गई। मैं प्रिया नहीं रही, राहुल नहीं रहे। केवल एक विशाल, शांत, चमकता हुआ विस्तार रह गया। कोई लहर नहीं थी, कोई आर्गेज्म नहीं था। बस एक अखंड उपस्थिति। समय की कोई गिनती नहीं रही।
जब होश लौटा तो राहुल के आँसू बह रहे थे। मेरे भी। हमने एक-दूसरे को पकड़ रखा था — अब उत्तेजना से नहीं, बल्कि किसी गहरी पहचान से।
राहुल ने धीरे से कहा — “सात बार लगा।”
मैंने उत्तर दिया — “हाँ… और ठीक लगा।”
उस रात के बाद हमने समझा कि शक्ति जल्दी नहीं आती। वह परीक्षा लेती है। धैर्य लेती है। और जब आती है तो शोर नहीं करती। बहुत शांत होकर आती है।
आज भी जब हम साधना करते हैं, तो याद रहता है — पहली रात की असफलता भी उतनी ही जरूरी थी जितनी सातवीं रात की पूर्णता।
क्योंकि जागरण कोई घटना नहीं, एक यात्रा है।