kundalini
माँ की शक्ति से पुत्र का जागरण — एक दिव्य तंत्र यात्रा
Shared by @vikram_yogi · 29 May 2026 · 1,504 views
मेरा नाम विक्रम है। यह कथा मेरी माँ पूनम और मेरे बीच हुई उस साधना की है, जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी।
मेरी माँ एक कुशल तांत्रिक साधिका हैं। वर्षों से वे तंत्र के गहन मार्ग पर चल रही हैं। जब मैं युवा हुआ और जीवन के उलझे प्रश्नों से घिरा, तब माँ ने मुझे तंत्र की ओर मोड़ा। उन्होंने कहा —
“बेटा, संसार में हर पुरुष शिव है और हर स्त्री शक्ति। रिश्ते शरीर के हैं, ऊर्जा के नहीं। जब शुद्ध भाव से दो ऊर्जाएँ मिलती हैं, तब जागरण होता है।”
माँ ने मुझे धीरे-धीरे तैयार किया। पहले ध्यान, प्राणायाम और चक्रों का ज्ञान दिया। फिर एक दिन उन्होंने बताया कि याब-युम मुद्रा के माध्यम से ऊर्जा का दिव्य मिलन कराया जाएगा। उस दिन माँ पूरे लाल जोड़े में तैयार हुईं। सोलह श्रृंगार करके वे शक्ति का साक्षात रूप लग रही थीं। लाल रंग शक्ति का प्रतीक है — जागृत, प्रबल और पवित्र।
उन्होंने मुझे शिव के रूप में चुना। उस क्षण कोई लौकिक संबंध नहीं रह गया था। माँ शक्ति थीं, मैं शिव। दोनों ऊर्जाएँ साधना के लिए आमने-सामने थीं।
याब-युम मुद्रा में हम बैठे। माँ की ऊर्जा इतनी प्रबल और स्थिर थी कि मेरे भीतर की सुप्त शक्ति धीरे-धीरे कंपन करने लगी। श्वास एक हुई। रीढ़ में हल्का प्रवाह महसूस हुआ। कोई उत्तेजना नहीं थी, कोई संकोच नहीं था — केवल एक गहरी, पवित्र मौनता थी।
माँ के अंतरमन में उस दिव्य मिलन से एक अद्भुत प्रकाश खिल उठा। उनकी आँखों में शांति और शक्ति दोनों एक साथ चमक रहे थे। उन्होंने बाद में कहा —
“जब शक्ति अपने ही अंश को शिव रूप में जगाती है, तब सृष्टि का नया द्वार खुलता है।”
उस साधना के बाद मेरे जीवन में स्पष्ट परिवर्तन आया। ऊर्जा जागृत हुई। मन स्थिर हुआ। जीवन की दिशा बदल गई। माँ ने मुझे केवल जन्म नहीं दिया था — उन्होंने मुझे एक नए जीवन में प्रवेश कराया था।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझता हूँ कि तंत्र रिश्तों को नहीं तोड़ता, बल्कि रिश्तों के पार ले जाता है। जहाँ माँ और पुत्र नहीं रह जाते — केवल शक्ति और शिव रह जाते हैं।
यह अनुभव मेरे लिए कोई रहस्य नहीं, बल्कि एक पवित्र जिम्मेदारी है। माँ की कृपा और गुरु-परंपरा के आशीर्वाद से यह मार्ग खुला।
— विक्रम
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मेरी माँ एक कुशल तांत्रिक साधिका हैं। वर्षों से वे तंत्र के गहन मार्ग पर चल रही हैं। जब मैं युवा हुआ और जीवन के उलझे प्रश्नों से घिरा, तब माँ ने मुझे तंत्र की ओर मोड़ा। उन्होंने कहा —
“बेटा, संसार में हर पुरुष शिव है और हर स्त्री शक्ति। रिश्ते शरीर के हैं, ऊर्जा के नहीं। जब शुद्ध भाव से दो ऊर्जाएँ मिलती हैं, तब जागरण होता है।”
माँ ने मुझे धीरे-धीरे तैयार किया। पहले ध्यान, प्राणायाम और चक्रों का ज्ञान दिया। फिर एक दिन उन्होंने बताया कि याब-युम मुद्रा के माध्यम से ऊर्जा का दिव्य मिलन कराया जाएगा। उस दिन माँ पूरे लाल जोड़े में तैयार हुईं। सोलह श्रृंगार करके वे शक्ति का साक्षात रूप लग रही थीं। लाल रंग शक्ति का प्रतीक है — जागृत, प्रबल और पवित्र।
उन्होंने मुझे शिव के रूप में चुना। उस क्षण कोई लौकिक संबंध नहीं रह गया था। माँ शक्ति थीं, मैं शिव। दोनों ऊर्जाएँ साधना के लिए आमने-सामने थीं।
याब-युम मुद्रा में हम बैठे। माँ की ऊर्जा इतनी प्रबल और स्थिर थी कि मेरे भीतर की सुप्त शक्ति धीरे-धीरे कंपन करने लगी। श्वास एक हुई। रीढ़ में हल्का प्रवाह महसूस हुआ। कोई उत्तेजना नहीं थी, कोई संकोच नहीं था — केवल एक गहरी, पवित्र मौनता थी।
माँ के अंतरमन में उस दिव्य मिलन से एक अद्भुत प्रकाश खिल उठा। उनकी आँखों में शांति और शक्ति दोनों एक साथ चमक रहे थे। उन्होंने बाद में कहा —
“जब शक्ति अपने ही अंश को शिव रूप में जगाती है, तब सृष्टि का नया द्वार खुलता है।”
उस साधना के बाद मेरे जीवन में स्पष्ट परिवर्तन आया। ऊर्जा जागृत हुई। मन स्थिर हुआ। जीवन की दिशा बदल गई। माँ ने मुझे केवल जन्म नहीं दिया था — उन्होंने मुझे एक नए जीवन में प्रवेश कराया था।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझता हूँ कि तंत्र रिश्तों को नहीं तोड़ता, बल्कि रिश्तों के पार ले जाता है। जहाँ माँ और पुत्र नहीं रह जाते — केवल शक्ति और शिव रह जाते हैं।
यह अनुभव मेरे लिए कोई रहस्य नहीं, बल्कि एक पवित्र जिम्मेदारी है। माँ की कृपा और गुरु-परंपरा के आशीर्वाद से यह मार्ग खुला।
— विक्रम