Tantra

तंत्र साधिका: समर्पण की अंजलि

admin 27 Jan 2021 1 min read 18,973

वह द्वार पर खड़ी थी। लाल साड़ी का पल्लू कंधे से फिसलकर बाएँ स्तन की रेखा तक आ गया था। चोली कसकर बँधी थी, फिर भी उसके उभार साँस लेने के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। माथे पर सिंदूर की एक लंबी रेखा, आँखों में काजल और होठों पर हल्की लालिमा। बाल खुले थे — लंबे, घने, कमर तक। जैसे उसने आज कोई बंधन रखने से मना कर दिया हो।

कमरे में दीपक जल रहे थे। गुरुजी ध्यान में बैठे थे। उनकी छाती नग्न थी, गले में रुद्राक्ष की माला। जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो साधिका ने धीरे से कदम बढ़ाया।

वह उनके सामने घुटनों के बल बैठ गई। दोनों हाथ जोड़कर अंजलि बनाई — ठीक छाती के सामने। उसके अंगूठे उसके स्तनों की नरम त्वचा को छू रहे थे। अंजलि में कुछ नहीं था। कोई फूल नहीं, कोई फल नहीं। केवल उसका पूरा अस्तित्व था।

“स्वामी…” उसकी आवाज में कंपन था। “आज मैं कुछ नहीं लाई। न पुष्प, न नैवेद्य। मैं स्वयं अंजलि लेकर आई हूँ। मेरा शरीर, मेरी योनि, मेरी श्वास, मेरी कुंडलिनी… सब आपकी अंजलि में। स्वीकार कीजिए।”

गुरुजी ने कुछ नहीं कहा। केवल दृष्टि से अनुमति दी।

साधिका उठी। उसने साड़ी का पल्लू गिराया। चोली के बंधन एक-एक करके खोले। वस्त्र धीरे-धीरे उतरते गए। पहले चोली, फिर साड़ी। अंत में वह पूर्ण नग्न खड़ी थी। दीपक की रोशनी में उसका शरीर सोने की तरह चमक रहा था। स्तनों के शिखर तनकर खड़े थे। उदर चिकना और कोमल। नाभि गहरी। उसके नीचे घने, काले बालों का त्रिकोण — योनि की पवित्र वेदी। जांघें थोड़ी-सी काँप रही थीं।

वह फिर से घुटनों पर बैठ गई। अब अंजलि और गहरी थी। उसने दोनों हाथों को अपने स्तनों के नीचे से गुजारते हुए ऊपर उठाया और गुरुजी के चरणों की ओर बढ़ा दिया — जैसे कह रही हो, “ये स्तन भी आपकी अंजलि में हैं।”

फिर उसने धीरे से उनके चरण छुए। अपने गाल को उनके पैरों से सटाया। बाल बिखर गए। उसने अपने होंठों से उनके चरणों का स्पर्श किया — लंबा, धीमा, समर्पित।

गुरुजी ने उसे उठाया। उनकी उँगलियाँ उसके जबड़े पर थीं। फिर गर्दन पर। फिर कंधे पर। साधिका की साँस तेज हो गई। उसके निप्पल और अधिक तन गए। योनि में नमी की पहली बूँद ने जांघों को छू लिया।

वे याब-युम में बैठे। साधिका उनकी गोद में आ गई। उसकी योनि ठीक उनके लिंग के ऊपर थी। दोनों केंद्र Separated थे केवल एक पतली रेखा से। उसने धीरे से कमर झुकाई। लिंग का गर्म स्पर्श उसकी योनि की भीगी पंखुड़ियों पर पड़ा। वह काँप उठी।

“प्रवेश दीजिए स्वामी…” उसने फुसफुसाया। “आपकी अंजलि अब खाली नहीं रहनी चाहिए।”

गुरुजी ने उसकी कमर पकड़ी और धीरे से नीचे उतारा। एक ही धीमी, गहरी गति में वे पूरी तरह उसके भीतर समा गए। साधिका की अंजलि अब टूट चुकी थी। उसके हाथ उनकी पीठ पर फैल गए। नाखून हल्के से चुभ रहे थे। उसके स्तन उनकी छाती से दबकर फैल गए थे। निप्पल उनकी त्वचा में धँस गए थे।

वे अचल हो गए। केवल श्वास चल रही थी। केवल धड़कनें एक हो रही थीं। केवल ऊर्जा — योनि से उठती हुई — रीढ़ में सर्प की तरह चढ़ रही थी।

साधिका की आँखें बंद थीं। उसके होठ खुले थे। गले से हल्की, काँपती आवाज़ निकल रही थी — न कराह, न चीख। केवल समर्पण की ध्वनि। उसके गर्भाशय में गहरी लहरें उठ रही थीं। हर लहर को वह नीचे नहीं गिरने दे रही थी। हर लहर को वह ऊपर धकेल रही थी — अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा… सहस्रार की ओर।

गुरुजी ने उसके कान में केवल एक शब्द कहा — “अब तुम अंजलि नहीं रही। अब तुम अर्पण हो गई।”

उस रात्रि साधिका ने कई बार अपना शरीर पूरी तरह दे दिया। कभी धीरे, कभी गहरा। कभी केवल कंपनों के साथ। हर बार उसकी योनि ने गुरुजी को और गहराई से पिया। हर बार उसकी कुंडलिनी और ऊपर उठती गई।

जब रात्रि अंतिम पहर में पहुँची, तो वह उनकी छाती पर लेटी थी। उनका लिंग अभी भी उसके भीतर था — अब उत्तेजना नहीं, केवल पूर्णता का स्पंदन। उसके बाल उनके सीने पर बिखरे थे। आँखों से अश्रु बह रहे थे।

उसने धीरे से कहा — “स्वामी… आज मेरी अंजलि खाली हो गई। अब उसमें कुछ बचा नहीं। सब कुछ आपमें समा गया।”

गुरुजी ने उसके माथे पर होंठ रखे और उत्तर दिया — “अंजलि खाली नहीं हुई। अंजलि अब अनंत हो गई है।”

बाहर पक्षी चहकने लगे थे। साधिका मुस्कुराई। उसका शरीर अभी भी गुरुजी से जुड़ा था। और उसकी आत्मा पहली बार पूरी तरह मुक्त थी।

समर्पण की अंजलि पूर्ण हो चुकी थी।

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