Tantra

याब-युम: कुंडलिनी जागरण का सबसे सरलतम उपाय

admin 27 Nov 2022 1 min read 4

कुंडलिनी जागरण की सैकड़ों विधियाँ हैं — प्राणायाम, बंध, मंत्र, ध्यान, तप। लेकिन उनमें से अधिकांश कठिन, लंबी और जटिल हैं। याब-युम मुद्रा इन सबके बीच सबसे सरल, सबसे प्राकृतिक और सबसे तीव्र मार्ग है। इसमें शरीर के विरुद्ध संघर्ष नहीं करना पड़ता। शरीर को ही साधन बना लिया जाता है।

याब-युम में स्त्री और पुरुष ऊर्जा आमने-सामने बैठती हैं। कोई भागदौड़ नहीं, कोई जबरदस्ती नहीं। केवल निकटता, श्वास और होश। फिर भी ऊर्जा इतनी प्रबलता से जागती है कि साधक को अपनी रीढ़ में सर्प के उठने का अनुभव होने लगता है।

याब-युम क्यों सबसे सरल है?

क्योंकि इसमें:

  • जटिल आसनों की जरूरत नहीं
  • लंबी कुंभक की जरूरत नहीं
  • कठिन तप की जरूरत नहीं
  • केवल दो शरीर, दो श्वास और एक शुद्ध भाव चाहिए

जब दो शरीर पूरी तरह सट जाते हैं, स्तन छाती से चिपक जाते हैं, नाभि एक-दूसरे को छूती है और जननेंद्रिय केंद्र निकट आते हैं, तो ऊर्जा स्वतः नीचे से ऊपर की ओर उठने लगती है। यह शरीर का स्वाभाविक नियम है। तंत्र ने बस इसे होश के साथ करने की कला सिखाई है।

तैयारी

  • स्नान करके स्वच्छ रहें।
  • कमरा मंद प्रकाश वाला और सुरक्षित हो।
  • हल्के या बिना वस्त्र के रहना अधिक प्रभावी होता है।
  • दोनों साधक कम से कम आधा घंटा पहले शांत बैठें।
  • कोई जल्दी न हो। उत्तेजना को दबाने की जरूरत नहीं, बस उसे देखने की जरूरत है।

मुद्रा की विधि (विस्तार से)

  1. पुरुष सुखासन या अर्ध-पद्मासन में बैठे। रीढ़ सीधी हो। लिंग अर्ध-उत्तेजित या शिथिल अवस्था में रह सकता है — जबरदस्ती उत्तेजना की जरूरत नहीं।
  2. स्त्री उसकी गोद में सामने की ओर बैठे। उसकी दोनों टाँगें पुरुष की कमर के चारों ओर लिपट जाएँ। योनि पुरुष के लिंग के निकट या ऊपर टिक जाए।
  3. दोनों के हृदय केंद्र पूरी तरह सट जाएँ। स्त्री के स्तन पुरुष की छाती पर दब जाएँ। निप्पल की गर्माहट महसूस हो।
  4. माथा या तो सटा रहे या दोनों की दृष्टि एक-दूसरे की आँखों में टिकी रहे।
  5. हाथ एक-दूसरे की पीठ पर हों। अंगुलियाँ रीढ़ की हड्डी का स्पर्श करें।

अब दोनों अचल हो जाएँ।

सबसे महत्वपूर्ण भाग — श्वास और ऊर्जा

अब गति बंद। केवल श्वास चल रही है।

  • दोनों एक ही लय में साँस लें।
  • श्वास लेते समय कल्पना करें कि ऊर्जा योनि और लिंग के केंद्र से खिंचकर रीढ़ में ऊपर जा रही है।
  • श्वास छोड़ते समय ऊर्जा पूरे शरीर में फैल रही है।
  • यदि उत्तेजना बढ़े तो हिलें नहीं। केवल मूलबंध हल्का सा लगाएँ और ऊर्जा को ऊपर धकेलें।

स्त्री अपनी योनि की दीवारों में कंपन महसूस कर सकती है। पुरुष अपने लिंग की नसों में स्पंदन महसूस कर सकता है। इन स्पंदनों को दबाने के बजाय उन्हें रीढ़ की ओर ले जाएँ।

कुछ देर बाद दोनों को लगेगा कि दो शरीर नहीं रह गए। केवल एक गर्म, कंपन करती हुई ऊर्जा का स्तंभ रीढ़ में उठ रहा है। यही कुंडलिनी का प्रारंभिक जागरण है।

गहराई में जाने पर

जब मुद्रा स्थिर हो जाए तो:

  • स्त्री हल्का सा अपनी योनि को संकुचित करे (मूलबंध)।
  • पुरुष भी मूलबंध लगाए।
  • दोनों की आँखें बंद हों या एक-दूसरे में खोई हों।
  • मानसिक जप करें — “ह्रीं” या “ॐ”।

अब ऊर्जा और तेज होगी। कभी-कभी अचानक लहर उठेगी — आनंद की, गर्मी की या कंपन की। उस लहर को बाहर न निकालें। उसे ऊपर की ओर ले जाएँ। सहस्रार तक।

कितनी देर करें?

शुरुआत में 15–20 मिनट पर्याप्त है। बाद में 45 मिनट से एक घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। बीच में यदि बहुत तीव्र उत्तेजना हो जाए तो थोड़ा अलग होकर श्वास पर ध्यान करें, फिर फिर से जुड़ जाएँ।

सावधानी

  • बिना भावनात्मक जुड़ाव और सम्मान के यह अभ्यास न करें।
  • यदि कोई एक भी असहज महसूस करे तो तुरंत रोक दें।
  • यह भोग का साधन नहीं, जागरण का साधन है। हर बार याद रखें।
  • अभ्यास के बाद दोनों शांत लेट जाएँ और ऊर्जा को शरीर में समाहित होने दें।

निष्कर्ष

याब-युम कुंडलिनी जागरण का सबसे सरलतम उपाय इसलिए है क्योंकि इसमें शरीर से लड़ाई नहीं करनी पड़ती। शरीर को ही गुरु बना लिया जाता है। दो शरीर जब पूर्ण निकटता और पूर्ण होश के साथ मिलते हैं, तो कुंडलिनी को जगाने के लिए और कुछ करना नहीं रहता। वह स्वयं उठती है।

सरल है। प्राकृतिक है। और अत्यंत गहन है।

बस भाव शुद्ध हो, होश बना रहे, और समर्पण पूरा हो। फिर याब-युम स्वयं सब कुछ कर देता है।

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